4.12.22: संत श्री आशारामजी आश्रम, बेंगलुरु में 4 दिसम्बर को गीता जयंती पर्व मनाया गया, श्रीमदभगवदगीता को सुन्दर, ऊँचे आसन पर स्थापित करके पुष्प धूप-दीप आदि से पूजन कर आश्रम में श्लोक पठन भी हुआ । अंत में कीर्तन, मंगल आरती पश्चात् सभी साधकों ने गीता पाठ का संकल्प भी लिया । साधकों द्वारा बेंगलुरु के विभिन्न क्षेत्रों में कन्नड़, तेलगु, तमिल, हिंदी व अंग्रेजी भाषा में श्रीमदभगवदगीता की प्रतियाँ बांटी गई।
पूज्य संत श्री आशारामजी बापू अपने सत्संग वचनामृत में बताते हैं की- गीता- ज्ञान की आवश्यकता क्यों ?
समाज जब गीता का ज्ञान भूलता है तब समाज में विद्रोह, अशांति, दुःख, कलह पैदा होते हैं और जब गीता के ज्ञान की तरफ मुड़ता है तो समाज में सुख-शांति, आनंद-उल्लास, जीवन्मुक्ति का आनंद निखरता है । गीता का ज्ञान बड़ा प्राचीन है । भगवद्गीता हारे हुए में हिम्मत भरती है, हिम्मतवाले को संयम -सदाचार का मार्ग देती है, अहिंसक पर वार नहीं करवाती और हिंसक से डरकर भागने को भी नहीं कहती; विघ्न-बाधाओं से जूझते हुए अपने जीवन-संग्राम में फतह करने की कुंजी देनेवाला धर्मग्रंथ भगवद्गीता है । इसके एकाध श्लोक का पाठ करने मात्र से तीर्थ करने जितना पूण्य का फल होता है ।