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अक्षय तृतीया को, बेंगलुरु आश्रम में संपन्न हुआ- एक दिवसीय जप- प्रार्थना शिविर
बेंगलुरु: संत आशारामजी आश्रम, बेंगलुरु में अक्षय तृतीया को, संपन्न हुआ- एक दिवसीय जप- प्रार्थना शिविर। जिसमें बेंगलुरु के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। प्रातः जप-संकल्प से कार्यक्रम की शुरुवात हुई, उसके बाद महामृत्युंजय मन्त्र का पूज्य बापूजी के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ससंकल्प हवन हुआ, फिर क्रमशः श्री आशारामायण जी का पाठ हुआ, सत्संग- भजन- कीर्तन के बाद मंगल आरती हुई व कार्यक्रम के अंत में आश्रम ट्रस्ट की ओर भंडारा का भी आयोजन हुआ। बेंगलुरु आश्रम संचालक दीपक नायक ने पूज्य बापूजी के सत्संग का सार बताया- अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्त्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखण्ड, वाहन आदि की खरीददारी से सम्बन्धित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था।इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता।

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