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Saint's incarnation is the ultimate benefactor - "Janma Karma Cha Me Divyam"

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Sant Shri Asharamji Ashram, Bengaluru, celebrated the 90th incarnation day of respected Bapuji with great enthusiasm through satsang-kirtan and lamp-lighting by devotees.

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संत आशारामजी बापू का 90वां अवतरण दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।


बेंगलुरु। संत आशारामजी आश्रम, बेंगलुरु में साधकों द्वारा पूज्य बापूजी के 90वें अवतरण दिवस के निमित्त सत्संग-कीर्तन व दीपप्रज्वलन कार्यक्रम बड़े ही धूम-धाम से मनाया गया। इस निमित्त पूरे दक्षिण भारत से साधक का जमावड़ा बेंगलुरु आश्रम में सुबह ही आ चूका था। कार्यक्रम की शुरूवात पूज्य श्री के उत्तम स्वास्थ्य हेतु महामृत्युंजय मंत्र के हवन से शुरू हुआ। तत्पश्चात श्री आशारामायण का पाठ के साथ वैदिक मंत्र से गुरुजी के चरण पादुका का पूजन हुआ। जन्मोत्सव के भजनों के बाद सभी साधक झूमें, फिर दीपोत्सव का आयोजन हुआ। अंत में पूणाहुति पर मंगल आरती के बाद ट्रस्ट की तरफ से सभी श्रद्धालुओं के लिए भंडारा का आयोजन हुआ। बेंगलुरु आश्रम संचालक दीपक नायक ने बताया की प्रातःस्मरणीय परम पूज्य संत आशाराम बापू ऐसे महापुरुष है, जिन्होंने अपने शिष्यों को भक्तियोग और ज्ञानयोग के साथ-साथ कर्मयोग भी सिखाया हैं। पूज्यश्री का कहना है कि- कर्म को करने की कला जान लो और उसे कर्मयोग बनाओ तो कर्म आपको बांधने वाले नहीं, भगवान से मिलाने वाले हो जायेंगे। भगवान ने हमें जो जानने, मानने और करने की शक्तियाँ दी हैं, उनका सदुपयोग करो। परहित के लिए कर्म करने से करने की शक्ति का सदुपयोग होता है। पूज्य बापूजी के इन्हीं वचनों का आदर करते हुए, हम शिष्यों द्वारा पूरे भारत में उनका यह अवतरण दिवस- पुण्य दिवस बनकर समाज की व्यापक सेवा का निमित्त बनता है, इसे हर वर्ष ‘सेवा-सत्संग-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। पूज्य बापूजी बताते है की इस दिवस पर जो भी सेवाकार्य करते हैं, वे करने का राग मिटाते हैं, भोगने का लालच मिटाते हैं और भगवान व गुरु के नाते परहित करते हैं। उन साधकों को जो आनंद आता होगा, जो कीर्तन में मस्ती आती होगी या गरीबों को भोजन कराने में जो संतोष का अनुभव होता होगा, विद्यार्थियों को नोटबुक बाँटने में तथा भिन्न-भिन्न सेवाकार्यों में जो आनंद आता होगा, वह आनंद अवर्णनीय होगा। वह जीवन क्या जिस जीवन में, जीवन को मुक्त बना न सकें। वह अज्ञानी अभिमानी है, जो मन का मोह मिटा न सके। मिटती है जिससे भ्रांति नही, मिलती है जिससे शांति नही। ऐ पथिक, उसका त्याग करो, जो प्रियतम तक पहुँचा न सकें।


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